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महामारी के दौर में भी यूक्रेन और ताइवान में बजाये जा रहे युद्ध के नगाड़े साम्राज्यवाद के पास मानवता को देने के लिए उन्माद और तबाही के सिवा कुछ नहीं है – आनन्द

महामारी के दौर में भी यूक्रेन और ताइवान में बजाये जा रहे युद्ध के नगाड़े
साम्राज्यवाद के पास मानवता को देने के लिए उन्माद और तबाही के सिवा कुछ नहीं है

– आनन्द

हाल के महीनो में कोरोना वायरस की नयी क़िस्म ओमिक्रॉन के दुनियाभर में फैलने की ख़बर सुर्ख़ियों में रही। ऐसे में किसी मानवीय व्यवस्था में यह उम्मीद की जाती कि दुनिया के तमाम देश एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हुए इस वैश्विक महामारी से निपटने में अपनी ऊर्जा ख़र्च करते। लेकिन हम एक साम्राज्यवादी दुनिया में रह रहे हैं। इसलिए इसमें बिल्कुल भी हैरत की बात नहीं है कि वैश्विक महामारी के बीच, एक ओर यूक्रेन में, तो दूसरी ओर ताईवान में युद्ध के नगाड़ों का कानफाड़ू शोरगुल लगातार बढ़ता जा रहा है। पूर्वी यूरोप में काला सागर के आस-पास के इलाक़े एवं पूर्वी एशिया में दक्षिण चीन सागर के इर्द-गिर्द के इलाके़ इस समय साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच रस्साकशी के मुख्य अड्डे बने हुए हैं। पश्चिमी मीडिया की मानें तो यूक्रेन को युद्ध के कगार पर लाने के लिए रूस ज़िम्मेदार है और ताईवान में युद्ध जैसे हालात पैदा करने के लिए चीन ज़िम्मेदार है। लेकिन सच तो यह है कि इन दोनों इलाक़ों में जो युद्धोन्माद फैलाया जा रहा है वह साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार करने की होड़ का नतीजा है जिसमें एक ओर अमेरिका व नाटो के साम्राज्यवादी देश हैं तो दूसरी ओर साम्राज्यवादी रूस व चीन हैं। इस अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा से पैदा होने वाली अस्थिरता का ख़ामियाज़ा केवल इन इलाक़ों की मेहनतकश अवाम को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की आम मेहनतकश जनता को भुगतना पड़ेगा।
पश्चिमी मीडिया में पिछले कई महीनों से यह दावा किया जा रहा है कि रूस यूक्रेन पर हमला करने वाला है। इस दावे के समर्थन में यह दलील दी जा रही है कि हाल के महीनों में रूस ने यूक्रेन की उत्तरी, पूर्वी व दक्षिणी सीमाओं के आसपास अत्याधुनिक हथियारों से लैस क़रीब एक लाख सैनिकों की तैनाती की है। साथ ही रूस की सेना बेलारूस में सैन्य अभ्यास भी कर रही है। इसके अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के एक हालिया लेख का भी हवाला दिया जा रहा है जिसमें उन्होंने रूस और यूक्रेन की साझा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत की बात करते हुए यह कहा है कि रूस और यूक्रेन के लोग एक ही क़ौम से ताल्लुक़ रखते हैं। लेकिन पश्चिमी मीडिया में आम तौर पर सच्चाई का दूसरा पहलू उजागर नहीं किया जाता है कि हाल के वर्षों में हज़ारों की संख्या में अमेरिका और नाटो के सैनिक और हथियार पूर्वी यूरोप में पोलैण्ड तथा तीन बाल्टिक देशों लिथुआनिया, लातविया और इस्तोनिया में रूस की सीमा की ओर तैनात किये गये हैं। यही नहीं, यूक्रेन के भीतर भी हथियारबन्द अमेरिकी सैनिक पहले से ही मौजूद हैं और अमेरिकी जंगी जहाज़ और जासूसी जहाज़ रूस की सीमा के निकट हवाई गश्त कर रहे हैं। गत 24 जनवरी को अमेरिका ने यह घोषणा की कि क़रीब 50 हज़ार अमेरिकी सैनिक जंगी जहाज़ों, टैंकों और मिसाइलों के साथ पूर्वी यूरोप में रूस की सीमा की ओर कूच करने की तैयारी कर रहे हैं। युद्ध जैसा माहौल बनाने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने यूक्रेन की राजधानी कीव से अपने सभी राजनयिकों को वापस बुलाने का फ़ैसला किया है। डेनमार्क के एफ़-16 जंगी जहाज़ लिथुआनिया की ओर कूच कर रहे हैं, स्पेन के फ़ाइटर जेट और नौसैनिक काला सागर की ओर कूच कर रहे हैं, फ़्रांसीसी सैनिक रोमानिया की ओर बढ़ रहे हैं और डच एफ़-35 बुल्गारिया के वायुक्षेत्र में गश्त कर रहे हैं।
युद्धोन्माद का यह माहौल दरअसल पूर्वी यूरोप में नाटो और रूस के बीच भूराजनीतिक और आर्थिक हितों के मद्देनज़र अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार करने को लेकर वर्षों से जारी रस्साकशी का नतीजा है। ग़ौरतलब है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद पिछले तीन दशकों के दौरान अमेरिकी नेतृत्व में नाटो ने पोलैण्ड, हंगरी, बुल्गारिया और रोमानिया जैसे पूर्वी ब्लॉक के देशों सहित सोवियत संघ के घटक देशों, जैसे तीन बाल्टिक देशों लिथुआनिया, लातविया और इस्तोनिया और यूक्रेन तक रूस की सीमा के निकट अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया है। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद लगे झटके से उबरते हुए इक्कीसवीं सदी में रूस ने इन देशों को वापस अपने प्रभाव-क्षेत्र में लाने की ज़ोर-आज़माइश शुरू कर दी। इसी का नतीजा 2008 में रूस द्वारा जॉर्जिया पर हमले के रूप में सामने आया। यूक्रेन इस सदी की शुरुआत से ही नाटो और रूस के बीच जारी खींचतान का मुख्य अड्डा बना हुआ है। 2004 में पश्चिमी देशों की शह पर हुई तथाकथित नारंगी क्रान्ति में आन्तरिक वजहों के साथ ही इस खींचतान की भी एक अहम भूमिका थी जिसके नतीजे के तौर पर पश्चिम समर्थित विक्टर यूश्चेंको सत्ता में आया, हालाँकि 2010 में रूस समर्थित यानुकोविच फिर से सत्ता पर क़ाबिज़ हो गया। 2014 में यानुकोविच के ख़िलाफ़ खड़े हुए यूरोमैदान आन्दोलन में भी पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों की एक भूमिका थी। उसके बाद रूस ने काला सागर तट पर स्थित क्रीमिया प्रायद्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया। ग़ौरतलब है कि क्रीमिया में ही सेवास्तोपोल बन्दरगाह स्थित है जो रूस के नियंत्रण में एकमात्र गरम पानी का बन्दरगाह है और अब रूस काला सागर में एक विशाल पुल के ज़रिए क्रीमिया को भौतिक रूप से भी अपने देश से जोड़ने की तैयारी कर रहा है। यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में स्थित दोनबास इलाक़े में अभी भी गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है जिसमें अब तक 14 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है। इस इलाक़े में स्थित लुगांस्क और दोनेत्स्क नामक दो राज्य पूरी तरह से रूस के प्रभाव में आ चुके हैं। दोनबास वही इलाक़ा है जहाँ सोवियत संघ के दौर में यूक्रेन में उद्योगों का तानाबाना खड़ा किया गया था। यूक्रेन में कोयले का 75 प्रतिशत भण्डार इसी इलाक़े में स्थित है और यूक्रेन का 30 प्रतिशत निर्यात इसी इलाक़े से होता आया है। ग़ौरतलब है कि यूक्रेन के पूर्वी व दक्षिणी हिस्से में रूसी भाषा बोलने वाले और रूस समर्थकों की बहुतायत है जबकि पश्चिमी व मध्य यूक्रेन में पश्चिमी देशों के समर्थकों की बहुतायत है। इस विशिष्ट जनसांख्यिकी की वजह से भी यूक्रेन के अलग-अलग हिस्सों पर नाटो व रूस का प्रभाव है। रूस यूक्रेन को नाटो और यूरोपीय संघ में शामिल नहीं होने देना चाहता है और वह अमेरिका और नाटो द्वारा यूक्रेन को दी जा रही सैन्य मदद की भी मुख़ालफ़त कर रहा है। यही खींचतान यूक्रेन की अस्थिरता के लिए ज़िम्मेदार है। साथ ही यूक्रेन में जारी युद्धोन्माद का एक कारण विभिन्न साम्राज्यवादी मुल्कों में महामारी के दौर में मन्दी, महँगाई, असमानता, बेरोज़गारी जैसी विकराल होती जा रही समस्याओं से आम जनता का ध्यान भटकाने के लिए शासकों द्वारा अन्धराष्ट्रवाद को हवा देना भी है। हाल के समय में रूस ने बेलारूस और कज़ाक़िस्तान में जनअसन्तोष पर क़ाबू पाने के लिए सोवियत संघ के इन पूर्व घटक देशों में भी अपनी पैठ मज़बूत की है।
यह सब एक ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिकी साम्राज्यवाद बीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में अपने उरूज़ पर पहुँचने के बाद अब ढलान पर है और रूस व चीन का संयुक्त साम्राज्यवादी ख़ेमा अपने उभार पर है और साम्राज्यवादी दुनिया की चौधराहट अपने हाथ करने के लिए प्रयासरत है। इक्कीसवीं सदी में इराक़, सीरिया और हाल ही में अफ़ग़ानिस्तान से बेआबरू होकर लौटे अमेरिकी साम्राज्यवादी अब अपना पूरा ज़ोर चीन और रूस के गठबन्धन का मुक़ाबला करने में लगा रहे हैं। हालाँकि नाटो के उसके सहयोगी साम्राज्यवादी देश रूस और चीन के साथ अपने सम्बन्ध बिगाड़ना नहीं चाह रहे हैं। मिसाल के लिए यूक्रेन के मसले पर यूरोपीय देश उतनी शिद्दत के साथ रूस के ख़िलाफ़ नहीं बोल रहे हैं जितना अमेरिका चाहता है। इसकी वजह यह है कि यूरोपीय देशों में गैस की खपत का 40 प्रतिशत रूस से आता है। रूस पश्चिमी साइबेरिया से बाल्टिक सागर होते हुए जर्मनी तक पाइप लाइन के ज़रिए जर्मनी में गैस पहुँचाने की नॉर्ड स्ट्रीम 2 परियोजना पर काम कर रहा है जिसके पूरा हो जाने के बाद उसे यूक्रेन के ज़रिए यूरोप तक गैस पहुँचाने वाले ख़र्चीले रास्ते को बाईपास करने का मौक़ा मिल जायेगा। इस वजह से जर्मनी रूस पर किसी क़िस्म का प्रतिबन्ध लगाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है।
जहाँ पूर्वी यूरोप के काला सागर के क्षेत्र में रूस की गतिविधियाँ अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं वहीं दूसरी ओर पूर्वी एशिया में दक्षिण चीन सागर के इलाक़े में चीन की गतिविधियाँ अमेरिकी साम्राज्यवाद के सिरदर्द का कारण बनी हुई हैं। चीन पर नकेल कसने के लिए अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में मिली शिकस्त के बाद ‘क्वाड’ और ‘ऑकस’ नामक दो संस्थाएँ बनायी हैं। ‘क्वाड’ में अमेरिका के अलावा जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं जबकि ‘ऑकस’ में अमेरिका के अलावा यूके और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस घेरेबन्दी के बावजूद पिछले कुछ महीनों के दौरान ताईवान में चीन के फ़ाइटर जेट और वारशिप का ताईवान के इर्दगिर्द मँडराने और अमेरिका और यूरोपीय देशों का ताईवान की स्वतंत्रता के पक्ष में बयान देने के बाद से लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है।
इन तमाम अन्तर-साम्राज्यवादी अन्तर्विरोधों के लगातार तीखे होने की वजह से बहुत-से लोग तीसरे विश्वयुद्ध के छिड़ जाने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन आज की दुनिया में संरक्षित बाज़ार की ग़ैर-मौजूदगी और एक ही देश में कई साम्राज्यवादी देशों की पूँजियों के लगे होने की वजह से विश्वयुद्ध जैसी स्थिति बनने की सम्भावना फ़िलहाल बेहद कम है, हालाँकि साम्राज्यवादी युद्ध के कई रंगमंच दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तैयार हो सकते हैं। जैसा हमने ऊपर देखा कि जहाँ एक ओर नाटो और रूस में तनातनी चल रही है वहीं दूसरी ओर रूस के साथ आर्थिक सम्बन्ध क़ायम किये रखना भी यूरोप के साम्राज्यवादी देशों के हित में है। इसी प्रकार चीन की अर्थव्यवस्था के तार भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था से काफ़ी क़रीबी से जुड़े हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष युद्ध जैसी स्थिति सभी साम्राज्यवादी देशों के पूँजीपति वर्ग के लिए नाज़ुक हालात पैदा कर सकती है। लेकिन साम्राज्यवादी अन्तर्विरोधों के एक हद से ज़्यादा गहराने पर किसी बड़े पैमाने के युद्ध की सम्भावना से बिल्कुल इन्कार भी नहीं किया जा सकता है। इसी वजह से एक ओर साम्राज्यवादी देश युद्ध की धमकी देते हुए युद्धोन्माद फैला रहे हैं लेकिन उसके साथ ही प्रत्यक्ष युद्ध की घोषणा करने में आनाकानी कर रहे हैं। लेकिन युद्धोन्माद की जो स्थितिबनायी जा रही है उसमें इस बात की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि हालात साम्राज्यवादियों के नियंत्रण से बाहर हो जायें और युद्धोन्माद वास्तविक युद्ध की ओर बढ़ जाये। जो भी हो इतना तो तय है कि यूक्रेन और ताईवान दोनो ही देशों में आने वाले दिनों में अस्थिरता बढ़ने ही वाली है और अफ़सोस की बात है कि किसी क्रान्तिकारी ताक़त की ग़ैर-मौजूदगी में फ़िलहाल इस अस्थिर परिस्थिति का लाभ दक्षिणपन्थी, अन्धराष्ट्रवादी ताक़तें उठाने में कामयाब होती दिख रही हैं। लेनिन ने बताया था कि साम्राज्यवादी युद्ध को क्रान्तिकारी गृहयुद्ध में तब्दील करना क्रान्तिकारी पार्टी का कार्य होता है। लेकिन ऐसा करने के लिए मज़दूर वर्ग की इन्क़लाबी पार्टी का होना अनिवार्य है।

मज़दूर बिगुल, फ़रवरी 2022साभार 

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