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सूचनाओं के अबाध प्रवाह में बाधक बनती सरकारें। सोशल मीडिया को इशारों पर नचाने के लिए दबाव का खेल।

सूचनाओं के अबाध प्रवाह में बाधक बनती सरकारें।

सोशल मीडिया को इशारों पर नचाने के लिए दबाव का खेल।

हाल ही में सोशल मीडिया खासकर ट्विटर के पीछे पड़ी सरकारें और मुक़दमों में उलझाने जैसे हथकंडे अपनाने पर वरिष्ठ पत्रकार खान सलाहुद्दीन का विश्लेषण। 

1896 में जब मारकोनी ने रेडियो की खोज की और टेलर ने 1927 में टेलीविजन का अविष्कार किया तब उन्होंने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी यह खोजें कभी सरकारों के प्रोपेगंडा का हथियार व अपनी छवि चमकाने और विरोधियों के चरित्र हनन का काम करेंगी। रेडियो रवांडा बीसवीं शताब्दी का सबसे कुख्यात प्रचार माध्यम साबित हुआ था वही बीबीसी ने इस मध्यम के सहारे दुनिया भर अटूट विश्वास अर्जित भी किया और दशकों तक लोग सत्य जानने के लिए उसपर आंखे मूंदकर भरोसा करते थे।जैसे-जैसे दुनिया में सूचना क्रांति परवान चढ़ी, सूचनाएं सरकारों से बंधन से मुक्त होती चली गई मगर तानाशाह ही नहीं अपितु चुनी हुई सरकारें तक सूचनाओं के अबाध प्रवाह को पसंद नहीं करतीं और हमेशा ही सूचनाओं को दबाने या उनको अपने हित में प्रचारित प्रसारित करने का काम करती रही हैं। रेडियो और टीवी पर नियन्त्रण रखकर लगभग सभी सरकारों ने इसका दुरुपयोग किया है।इंटरनेट की खोज के बाद भी सरकारें सूचनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए प्रयासरत रही हैं। भारत में सन 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी कानून पास हुआ और तेजी से विस्तार पा रही वर्चुअल दुनिया को भी भारत में कानून से बांध दिया गया। अब सरकारों के हाथ में इस कानून के रूप में एक हथियार मिल गया था जिसके सहारे वो इस क्षेत्र में हो रही गतिविधियों पर अपना डंडा चला सकती थी। केंद्र और सभी राज्य सरकारों ने इस क़ानून का खूब दुरपयोग किया। भाजपा के 2014 में सत्ता में आने मे सोशल मीडिया का बड़ा रोल माना जाता है जब तक दूसरे राजनैतिक दल इसकी पहुँच और ताकत का अंदाजा लगा पाते मोदी ने इसका भरपूर उपयोग कर अपने लिए माहौल तैयार कर लिया। अच्छे दिन, गुजरात मॉडल और विकास को चुनावी मुद्दा बना कर पहली बार पूर्ण वाली भाजपा सरकार केंद्र में सत्तारूढ़ हो गयी। समस्या तब आनी शुरू हुई जब उनके विरोधियों ने भी सोशल मीडिया को ही मोदी विरोध का साधन बनाने का प्रयास किया। अनेक शोधों और सामने आई खबरों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि फेसबुक में कभी भी केंद्र की मौजूदा भाजपा सरकार से टकराने की कोशिश नहीं की बल्कि पिछले कई चुनावों में अपने स्तर से पार्टी की मदद ही की है। जबकि शुक्ष्म ब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने सरकार के सभी आदेशो को मानने में असमर्थ जाहिर की। हाल ही में सोशल मीडिया से लिए जारी नए नियमों का पालन भी पूरी तरह से नहीं किया।पिछले वर्ष हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में पराजय के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों द्वारा कैपिटोल हिल पर चढ़ाई करने के सम्बन्ध में ट्रंप पर फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में उनका ट्वीटर खाता स्थाई रुप से बंद कर दिया गया था ट्विटर के इस हिम्मत भरे क़दम को पूरी दुनिया में सराहा गया था।ट्विटर और भाजपा सरकार में टकराव उस समय चरम पर पहुँच गया जब भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के एक वीडियो को ट्वीटर द्वारा छेड़छाड़ किया हुआ मीडिया का टैग लगा दिए जाने और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद द्वारा टैग हटाने के आदेश को  ट्विटर  माना जिसके बाद ट्विटर के गुरुग्राम स्थित कार्यालय पर दिल्ली पुलिस का छापा और उसके बाद ताबड़तोड़ एफआईआर का सिलसिला जारी है। ग़ज़िआबाद के लोनी थाने में ट्विटर के विरुद्ध एक आपराधिक मुक़दमा दर्ज कर ट्विटर के भारत में सर्वोच्च अधिकारी मनीष माहेश्वरी को तलब किया गया। नेहले पे दहला की चाल चलते हुए 26 जून को ट्विटर ने भी अमरीकी कानूनों का सहारा लेकर एक घंटे के लिए सुचना प्रौध्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद के ट्विटर खाते को बाधित कर दिया था।सूचनाओं के वैश्विक फैलाव और आईटी क्षेत्र के विश्वव्यापी स्वरुप को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए क़ानून बनाने की आवश्यक्ता है जिससे सरकारें स्थानीय स्तर पर सोशल मीडिया से जुड़ी कंपनियों का गला न घोंट सकें। चूँकि स्वतंत्र संचार माध्यम लोकतंत्र की आत्मा है यदि लोगों के पास गलत सूचनाएं पहुंचेंगी तो बहुत सम्भावना है वो निर्णेय भी गलत ही लेंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और व्यापक स्वीकार्य क़ानून तैयार करे ताकि इसपर हस्ताक्षर करने वाले देश सम्प्रेषण से जुडी संस्थाओं का उत्पीड़न न कर सकें।

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