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काले सोने का फलता फूलता अवैध कारोबार, राजस्व क्षति का खनिज विभाग के पास कोई आकड़ा नहीं खनिज अपराध मोटे राजस्व की उगाही का जरिया बन गया हैं।


काले सोने का फलता फूलता अवैध कारोबार

राजस्व  क्षति का खनिज विभाग के पास कोई आकड़ा नहीं

खनिज अपराध मोटे राजस्व की उगाही का जरिया बन गया हैं।

बैतूल। मप्र राज्य। मप्र राज्य के बैतूल जिले में अवैध कोयला खदाने संचालित हो रहीं हैं जिसे रेट होल माईंन्स कहते हैं। अवैध कोयला खदानों की संख्या कितनी हैं, कितना कोयला निकाला जा चुका हैं, राजस्व क्षति का आंकड़ा खनिज विभाग के पास उपलब्ध नहीं हैं। डम्पर परिवहन करते हुए जप्त हो जाते हैं तो जुर्माना राशि भरकर छूट भी जाते हैं। कोयला माफिया की प्रशासन पर पकड़ का नतीजा हैं कि अवैध खदानें चल रहीं हैं, दांडिक कार्यवाही नहीं हो रहीं हैं।खान एवं खनिज अधिनियम 1957 में कोयला का अवैध उत्खन्न, परिवहन एवं भण्डारण अपराध हैं। कानून में अपराध तब समाप्त हो जाता हैं जबअवैध उत्खनित खनिज का राजस्व जमा कर दिया जाता हैं। मामला राजस्व न्यायालय से आगे नहीं बढ़ पाता हैं। दांडिक न्यायालय तक मामला खनिज विभाग प्रमुख भेजते नहीं हैं। कोयला माफिया को यही से एक ताकत मिलती हैं जिससे कारोबार चलता हैं। बैतूल जिले के 5 गाॅवों में कायले की 100 से अधिक अवैध खदाने चलती हैं। स्थानीय स्तर पर मजदूरों से कायेले का खनन करवाया जाता हैं। प्रतिदिन 40 डम्पर कोयले का उत्पादन होता हैं जिसकी सप्लाई औद्योगिक क्षेत्रों में की जाती हैं। भारत सरकार द्वारा लाॅक डाउन घोषित किए जाने के दौरान भी बेरोक टोक कोयला डम्पर चलते रहे हैं। पुलिस विभाग, खनिज विभाग और राजस्व विभाग के सहयोग से कोयले का कारोबार चलता रहा हैं। 

कोयला माफिया की पकड़ का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता हैं कि राजस्व न्यायालय कलेक्टर बैतूल द्वारा 06 कोयला अवैध परिवहन के मामलों में खनिज विभाग को 17.11.2020 को दांडिक कार्यवाही के लिए दांडिक न्यायालय में मुकदमें पेश करने के लिए आदेश दिए गए लेकिन विभाग प्रमुख ज्ञानेश्वर तीवारी ने कोई रूची नहीं दिखाई। राज्य सरकार को करीब 30 लाख रूपए के राजस्व की क्षति हो चुकी हैं लेकिन खनिज विभाग को कोई फर्क नहीं पड़ा हैं। कोयला माफिया की पकड़ के चलते स्थानीय कांग्रेसी विधायक ब्राम्हा भलावी ने मामले को कभी विधान सभा में नहीं उठाया तो भारतीय जनता पार्टी के सांसद डी.डी. उईके ने भी संसद में कभी नहीं उठाया हैं। राजनीतिक दलों के लिए खनिज माफिया तो चुनाव के दौरान पार्टी फण्ड की व्यवस्था करते हैं। इसलिए भी जिला प्रशासन अवैध कोयला खदानों तक कभी नहीं पहुंच सका हैं। इन कोयला खदानों से अब तक कुल कितना कोयला निकाला जा चुका हैं, खनिज विभाग के पास राजस्व क्षति का कोई आकड़ा उपलब्ध नहीं हैं।खनिज अपराध के मामलों में खनिज विभाग की जांच केवल खनिज के अवैध परिवहन तक सीमित रहती हैं जो कि उत्खन्न स्थल तक कभी पहुंचती नहीं हैं। खनिज माफिया की सहमति से एक वर्ष में 10 से भी कम डम्पर अवैध परिवहन में पुलिस एवं खनिज विभाग से जप्त किए जाते हैं जबकि कारोबार तो 365 दिन रात चलता हैं। सरकारी कोयला महंगा हैं जबकि अवैध कोयला बेहद सस्ता पड़ता हैं। उद्योग मजबूरी में सरकारी कोयला खरीदते हैं लेकिन पूर्ती तो अवैध कोयले से ही होती हैं। इसलिए बाजार में अवैध कोयले की मांग बरकरार हैं। मप्र सरकार की खनिज नीति में खनिज अपराध मोटे राजस्व की उगाही का जरिया बन गया हैं। खनिज नियम में पहले कभी राजस्व न्यायालय में केवल प्रषमन की कार्यवाही की जाती थी और अर्थदण्ड आरोपित करने का अधिकार दांडिक न्यायालय के पास सुरक्षित था लेकिन अब अर्थदण्ड आरोपित करने का अधिकार सरकार ने कलेक्टर को दे दिया हैं। न्याय के सभी रास्तो को बंद करने के लिए राज्य सरकार ने खनिज नियम में अपील एवं पुनरीक्षण की व्यवस्था करके रखी हैं जिसमें कलेक्टर के किसी भी आदेश के विरूद्ध पुनरीक्षण नहीं हो सकता हैं। राजस्व अधिकारी एक एैसे मामले में जिसमें राज्य सरकार एक पक्षकार हैं, न्याय दान के पवित्र कार्य में राज्य सरकार के विरूद्ध कोई निर्णय नहीं दे सकते हैं क्योंकि मामला राजस्व का हैं, सरकार को नुक्सान होता हैं।

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