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खनिज अपराध में नहीं हो रही दांडिक कार्यवाही खनिज विभाग से मिल रहा अपराधियों को संरक्षण

खनिज अपराध में नहीं हो रही दांडिक कार्यवाही
खनिज विभाग से मिल रहा अपराधियों को संरक्षण

एडवोकेट भरत सेन

बैतूल। मप्र राज्य। भारत की सुप्रीम कोर्ट ने मप्र राज्य सरकार से पूछ चुकी हैं कि खान एवं खनिज अधिनियम 1957 में कार्यवाही के बिना खनिज अपराध का नियंत्रण कैसे होगा? गौण खनिज नियम में प्रषमन अथवा अर्थदण्ड राषि जमा करके अपराधी छूट जाते हैं तो अपराध का नियंत्रण कैसे होगा? मप्र हाई कोर्ट कह चुकी हैं कि खान एवं खनिज अधिनियम 1957 का विकल्प गौण खनिज नियम 1996 नहीं हैं। अधिनियम एवं नियम में वैधानिक स्थिति स्पष्ट होने के बाद भी मप्र राज्य सरकार का खनिज साधन विभाग खनिज अपराधियों के विरूद्ध दांडिक न्यायालय में मुकदमें पेष नहीं कर रहा हैं।
राजस्व न्यायालय कलेक्टर बैतूल राकेष सिंह की अदालत में खनिज अपराध के मुकदमों की स्थिति ठीक एैसी ही हैं। खनिज अपराध के बड़े मामलों में कारण बताओं नोटिस के जवाब में खनिज अपरोपी प्रषमन अथवा अर्थदण्ड राषि जमा करने से इंकार कर चुके हैं, कुछ मामलों में राजस्व न्यायालय के आदेष के बाद भी अर्थदण्ड राषि जमा नहीं की गई हैं। खनिज विभाग बैतूल द्वारा एैसे तमाम मामलों में खान एवं खनिज अधिनियम 1957 की अपराध धारा 4/21 (1) के दण्डनीय मामले दांडिक न्यायालय के समक्ष पेष नहीं किए जा रहे हैं। कानून में खनिज अपराध एक संज्ञेय अपराध हैं जिसमें 60 दिवस के भीतर अपराध की तहकीकात पूरी करके मामलों को सिविल एवं दांडिक कार्यवाही हेतु राजस्व न्यायालय एवं दांडिक न्यायालय में पेष करना वैधानिक रूप से आवष्यक हैं। राजस्व न्यायालय में अपराध का प्रषमन होने पर दांडिक कार्यवाही स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
न्यायालय कलेक्टर बैतूल में खनिज अपराध के विचाराधीन मामलों में खनिज अधिकारी बैतूल ज्ञानेष्वर तिवारी कोई रूची नहीं रखते हैं तो खनिज विभाग की तरफ से सरकारी वकील मामलों में पैरवी के लिए आते ही नहीं हैं। राजस्व न्यायालय में पेषी तारीखों पर खनिज निरीक्षकों को बुलाना पड़ता हैं तब गवाह के ब्यान दर्ज हो पाते हैं।
खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल तो उठाता हैं क्योंकि राजस्व न्यायालय में विचाराधीन ज्यादातर मामलों में वाहन एवं मषीन चालक पर राजस्व की वसूली का मुकदमा चल रहा हैं जबकि मुकदमा तो वाहन एवं मषीन चालक तथा पंजीकृत स्वामी पर चलना चाहिए। अवैध भण्डारण एवं उत्खन्न के कुछ मामले एैसे भी हैं जिनमें अपराध में प्रयुक्त मषीन एवं वाहन को जप्त नहीं किया गया हैं। अधिनियम के मापदण्डों पर खनिज अपराध की तहकीकात नहीं होती हैं। इस तरह के मामलों में राजस्व वसूली संभव नहीं हैं।
खनिज अधिकारी ज्ञानेष्वर तिवारी की कार्यप्रणाली से खनिज अपराधी बेहद संतुष्ट हो सकते हैं क्योंकि कोयला एवं रेत के अवैध उत्खन्न, भण्डारण एवं परिवहन के मामले दांडिक न्यायालय में पेष नहीं किए जाते हैं। खनिज अधिकारी की मेहबानी के कारण खनिज अपराधी 5 वर्ष तक के कारावास एवं 5 लाख रूपए तक के अर्थदण्ड तथा वाहन राजसात के राजदण्ड से भय मुक्त होकर अपना कारोबार कर रहे हैं।
कानून एवं नियम की जानकारी देते हुए भारत सेन अधिवक्ता कहते हैं कि खान एवं खनिज अधिनियम 1957 में खनिज अपराध के मामलों में सिविल एवं दांडिक दायित्व का निर्धारण किया जाता हैं जिसके लिए मामलों को राजस्व एवं दांडिक न्यायालय में एक साथ पेष किया जाना आवष्यक हैं। खनिज अपराध के मामले दोनो न्यायालय के समक्ष तब पेष किए जाते हैं जबकि खनिज विभाग के नोटिस पर खनिज अपरोपी प्रषमन करने से इंकार कर दें। राजस्व वसूली को सुनिष्चित करने के लिए दांडिक कार्यवाही का अधिनियम में विधान किया गया हैं।

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